औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति : --


अंग्रेजों की शासन की स्थापना से पूर्व भी भारत की अपनी स्वतंत्र अर्थव्यवस्था थी । यद्यपि जन सामान्य की जीविका और सरकार की आय का मुख्य स्रोत कृषि था  फिर भी देश की अर्थव्यवस्था में विभिन्न प्रकार की  निर्माण गतिविधियां होती थी सूती और रेशमी वस्त्रों धातु, मणिरत्न आदि से जुड़ी शिल्प कलाओं के उत्कृष्ट केंद्र के रूप में भारत विश्व में सुविख्यात हो चुका था भारत में बनी इन चीजों की विश्व के बाजारों में अच्छी सामग्री के प्रयोग तथा उचित स्तर की कलात्मकता के आधार पर बड़ी प्रतिष्ठा थी । औपनिवेशिक शासकों द्वारा रची गई आर्थिक नीतियों का उद्देश्य भारत का आर्थिक विकास नहीं बल्कि अपनी मूल देश की आर्थिक हितों का संरक्षण और संवर्धन ही था । इन नीतियों ने भारत की अर्थव्यवस्था के स्वरूप के मूल रूप को ही बदल डाला और भारत इंग्लैंड के कच्चे माल का पूर्ति करता बन गया तथा तैयार माल का आयात करता बन गया । वास्तविकता यह थी कि उन्होंने कभी इस देश की राष्ट्रीय तथा प्रति व्यक्ति आय का आकलन करने का भी ईमानदारी से कोई प्रयास नहीं किया । लोगों ने निजी स्तर पर आकलन किया पर उनके अनुमानों में बहुत विसंगतियां और आपसी मतभेद पाए गए हैं । आकलन कर्ताओं में दादा भाई नौरोजी, विलियम डिगनले, शिवराज डॉक्टर, वीके आरवी राव आदि प्रमुख रहे हैं । औपनिवेशिक काल के दौरान राव द्वारा लगाए गए अनुमान बहुत महत्वपूर्ण माने जाते हैं फिर भी सभी अध्ययन करता एक बात पर सहमत  रहे हैं कि बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध भारत की राष्ट्रीय आय की वार्षिक वृद्धि दर 2% से कम ही रही है । प्रति व्यक्ति उत्पाद वृद्धि तो मात्र आधा प्रतिशत ही रही है।

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